लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ ‘लठैती’!जब तर्क, कानून और लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ें, तब लाठी और दबाव क्यों बन रहे हैं सबसे बड़ा हथियार?

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chief editor -shailendra tiwari 

लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ ‘लठैती’!जब तर्क, कानून और लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ें, तब लाठी और दबाव क्यों बन रहे हैं सबसे बड़ा हथियार?


कटनी। वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर पाराशर की कलम से।भारतीय लोकतंत्र की इमारत चार मजबूत स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता—पर खड़ी मानी जाती है। लेकिन बदलते दौर में लोकतंत्र के बीच एक ऐसा अनौपचारिक ‘पांचवां स्तंभ’ भी दिखाई देने लगा है, जिसका कोई संवैधानिक दर्जा नहीं, कोई औपचारिक नियुक्ति नहीं और कोई जवाबदेही नहीं।

इसे आम भाषा में कहा जा सकता है—‘लठैती’।

लठैती यानी बल, दबाव, धमकी, भीड़ और प्रभाव के सहारे अपनी बात मनवाने की कोशिश।

जब सदनों में बहस की जगह शोर बढ़ने लगे, प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठने लगें, न्याय मिलने में लंबा इंतजार हो और पत्रकारिता के सामने दबाव खड़े होने लगें, तब कई बार लोकतांत्रिक रास्तों के बजाय सड़क की ताकत को आगे किया जाने लगता है।

कहीं प्रदर्शन के नाम पर हंगामा, कहीं विरोध के नाम पर घेराव, कहीं सोशल मीडिया पर संगठित ट्रोलिंग और कहीं असहमति की आवाज को दबाने के लिए धमकी—क्या यही लोकतंत्र का नया चेहरा बनता जा रहा है?

‘लठैती’ किसी एक दल की नहीं!

इस कथित पांचवें स्तंभ की खासियत यह है कि यह किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं है।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, जब भी तर्क कमजोर पड़ता है तो भीड़ और दबाव का सहारा लेने की प्रवृत्ति दिखाई दे सकती है।

कभी इसे जनआक्रोश कहा जाता है, कभी स्वाभाविक प्रतिक्रिया और कभी आंदोलन का नाम दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि असहमति का जवाब तर्क से होगा या ताकत से?

मीडिया सवाल पूछे तो उसे एजेंडे वाला बता देना, विरोधी आवाज उठाए तो उसे साजिश का हिस्सा बताना और कानून की प्रक्रिया लंबी लगे तो भीड़ के दबाव को रास्ता बना लेना—क्या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करता है?

लाठी से बहस खत्म हो सकती है, समस्या नहीं!

लोकतंत्र की खूबसूरती ही असहमति में है।

विधायिका का काम कानून बनाना है।

कार्यपालिका का काम कानून लागू करना है।

न्यायपालिका का काम कानून और संविधान की कसौटी पर न्याय करना है।

और पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना तथा जनता तक तथ्य पहुंचाना है।

लेकिन लठैती का काम क्या है?

वह न कानून बनाती है, न लागू करती है, न न्याय करती है और न ही लोकतांत्रिक निगरानी।

वह केवल दबाव बनाती है, डर पैदा करती है और बहस को ताकत के बल पर खत्म करने की कोशिश करती है।

सबसे बड़ा खतरा—जवाबदेही का अभाव

लोकतंत्र में विधायक जनता के प्रति जवाबदेह हैं। अधिकारी कानून और व्यवस्था के प्रति जवाबदेह हैं। न्यायपालिका संविधान के प्रति जवाबदेह है और पत्रकारिता अपने पाठकों-दर्शकों तथा तथ्यों के प्रति जवाबदेह होनी चाहिए।

लेकिन ‘लठैती’ किसके प्रति जवाबदेह है?

यही उसका सबसे खतरनाक पहलू है।

जब भीड़ कानून से ऊपर समझने लगे, जब धमकी तर्क का विकल्प बन जाए और जब ताकत का इस्तेमाल विचारों को दबाने के लिए होने लगे, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है।

लोकतंत्र को लाठी नहीं, कानून चाहिए

विरोध लोकतंत्र का अधिकार है। आंदोलन लोकतंत्र की ताकत है। आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है।

लेकिन हिंसा, धमकी और दबाव को लोकतांत्रिक अधिकार का नाम नहीं दिया जा सकता।

लोकतंत्र नारों से नहीं, संवाद से चलता है।

लाठी से नहीं, कानून से चलता है।

धमकी से नहीं, तर्क से चलता है।

और भीड़ की ताकत से नहीं, जनता के वोट से चलता है।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि लोकतंत्र के चारों वास्तविक स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता—अपनी जिम्मेदारियों को मजबूती से निभाएं।

क्योंकि जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, तभी गैर-संवैधानिक ताकतों के लिए जगह बनती है।

याद रखना होगा—लाठी लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ नहीं हो सकती।

वह लोकतंत्र की दीवार पर पड़ी एक ऐसी खतरनाक वस्तु है, जिसे उठाने के बजाय कानून के हवाले कर देना ही लोकतांत्रिक समाज की पहचान है।

वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर पाराशर की कलम से—एक सवाल भी, एक चेतावनी भी।

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