मध्यप्रदेश पर कर्ज का पहाड़!28 साल में 21,959 करोड़ से 4.66 लाख करोड़ तक पहुंचीं देनदारियां
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chief editor -shailendra tiwari
मध्यप्रदेश पर कर्ज का पहाड़!28 साल में 21,959 करोड़ से 4.66 लाख करोड़ तक पहुंचीं देनदारियां
कर्ज बढ़ा… ब्याज बढ़ा… अब सवाल—आने वाली पीढ़ियां कितना चुकाएंगी?
विशेष पड़ताल — मध्यप्रदेश कटनी जिला के वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर पाराशर की कलम से
मध्यप्रदेश के विकास, सड़क, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार को उधारी लेना पड़ता है। लेकिन जब देनदारियां लगातार बढ़ती जाएं, ब्याज का बोझ बढ़े और कर्ज की रफ्तार अर्थव्यवस्था की वृद्धि से ज्यादा हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
CAG की राज्य वित्त रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार मध्यप्रदेश की कुल बकाया देनदारियां 4,66,027 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी थीं।
वहीं 2026-27 के बजट अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष के अंत तक राज्य की बकाया देनदारियां GSDP की करीब 32.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
21,959 करोड़ से 4.66 लाख करोड़—कर्ज का लंबा सफर
1998-99 में तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश की कुल देनदारियां करीब 21,958.63 करोड़ रुपये थीं।
हालांकि उस समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था, इसलिए उस आंकड़े की आज के मध्यप्रदेश से सीधी तुलना तकनीकी रूप से उचित नहीं होगी।
लेकिन तुलनीय आंकड़े बताते हैं कि 2019-20 में मध्यप्रदेश की कुल देनदारियां करीब 2.30 लाख करोड़ रुपये थीं, जो 2024-25 में बढ़कर 4.66 लाख करोड़ रुपये हो गईं।
यानी महज पांच वर्षों में देनदारियों में करीब 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि हुई।
क्या पूरा 4.66 लाख करोड़ बाजार का कर्ज है?
नहीं।
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम तथ्य है।
2024-25 में कुल देनदारियों में लगभग—
- ₹3,33,216 करोड़ — आंतरिक ऋण
- ₹66,345 करोड़ — केंद्र सरकार से ऋण
- ₹68,874 करोड़ — Public Account Liabilities
- ₹568 करोड़ — संबंधित ऑफ-बजट उधारी शामिल थी।
इसलिए इसे केवल “बाजार का कर्ज” कहना सही तस्वीर नहीं होगी। सही शब्द है—मध्यप्रदेश सरकार की कुल बकाया देनदारियां।
ऑफ-बजट उधारी ने बढ़ाई चिंता
CAG की रिपोर्ट में ऑफ-बजट उधारी को लेकर भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
31 मार्च 2025 तक राज्य सरकार द्वारा बताई गई ऑफ-बजट उधारी ₹3,468.34 करोड़ थी। इसके अलावा CAG ऑडिट में राज्य PSU और अन्य प्राधिकरणों के माध्यम से करीब ₹1,630.84 करोड़ की अतिरिक्त ऑफ-बजट उधारी का भी पता चला।
यानी सवाल सिर्फ सरकार के बजट में दिखाई देने वाले कर्ज का नहीं है। सवाल यह भी है कि सरकारी संस्थाओं के माध्यम से कितनी देनदारी पैदा हो रही है और अंततः उसका भार किस पर पड़ेगा?
CAG की चेतावनी—कर्ज की रफ्तार अर्थव्यवस्था से तेज
CAG की Debt Sustainability Analysis में चिंता जताई गई कि पिछले तीन वर्षों में राज्य का कर्ज अर्थव्यवस्था की वृद्धि से तेज गति से बढ़ा है।
अगर आर्थिक विकास की रफ्तार कमजोर पड़ती है और उधारी लगातार बढ़ती रहती है, तो भविष्य में ऋण स्थिरता पर दबाव बढ़ सकता है।
ब्याज में जा रहे हजारों करोड़
2024-25 में मध्यप्रदेश सरकार ने करीब ₹25,887.86 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान पर खर्च किए।
वहीं 2026-27 के बजट में ब्याज भुगतान के लिए करीब ₹33,735 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
यानी हर साल हजारों करोड़ रुपये सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहे हैं।
सवाल यह है—अगर बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज और पुराने दायित्वों में चला जाएगा, तो नई सड़क, अस्पताल, स्कूल, सिंचाई और रोजगार के लिए कितनी वित्तीय गुंजाइश बचेगी?
राजकोषीय घाटा भी दबाव में
2024-25 में राज्य का वास्तविक राजकोषीय घाटा करीब ₹64,387.72 करोड़, यानी GSDP का 4.28 प्रतिशत रहा।
CAG ने सब्सिडी में भी भारी वृद्धि दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार सब्सिडी पिछले वर्ष की तुलना में करीब ₹23,320 करोड़ यानी 114 प्रतिशत बढ़ी।
यानी सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—जनकल्याणकारी योजनाएं जारी रखना और साथ ही वित्तीय अनुशासन बनाए रखना।
2026-27 में तस्वीर क्या है?
मध्यप्रदेश सरकार ने 2026-27 के लिए GSDP करीब ₹18.48 लाख करोड़ अनुमानित किया है।
बजट में—
राजकोषीय घाटा: ₹71,458 करोड़
राजकोषीय घाटा अनुपात: 3.9%
राजस्व अधिशेष: ₹44 करोड़
ऋण पुनर्भुगतान: ₹34,437 करोड़
कुल व्यय: ₹4,23,360 करोड़
का अनुमान रखा गया है।
लेकिन बकाया देनदारियां GSDP के 32.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
कर्ज बुरा नहीं… लेकिन कर्ज का इस्तेमाल कैसा?
यह समझना भी जरूरी है कि हर कर्ज खराब नहीं होता।
अगर उधार लेकर सिंचाई परियोजनाएं, सड़कें, पुल, अस्पताल, औद्योगिक क्षेत्र और ऐसी परिसंपत्तियां बनाई जाती हैं जो भविष्य में आर्थिक गतिविधि और आय बढ़ाती हैं, तो कर्ज विकास का साधन बन सकता है।
लेकिन अगर उधारी का बड़ा हिस्सा राजस्व खर्च, सब्सिडी, वेतन-पेंशन, ब्याज और पुराने कर्ज की अदायगी में चला जाए, तो आने वाली सरकारों और पीढ़ियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
जब कर्ज लिया जा रहा है तो बजट खर्च क्यों नहीं हो रहा?
CAG ने 2024-25 में कई विभागों में स्वीकृत बजट और वास्तविक खर्च के बीच अंतर भी दर्ज किया।
एक मामले में ₹4,930.82 करोड़ के प्रावधान के मुकाबले ₹3,838.89 करोड़ ही खर्च हुए, यानी करीब ₹1,091.93 करोड़ की राशि खर्च नहीं हो सकी।
इससे सवाल उठता है—
एक तरफ विकास के लिए सरकार कर्ज ले रही है, दूसरी तरफ स्वीकृत बजट का पैसा पूरी तरह खर्च क्यों नहीं हो पा रहा?
जनता को सिर्फ कर्ज नहीं, पूरा हिसाब चाहिए
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार ने केवल कितना कर्ज लिया।
सवाल होना चाहिए—
कर्ज किससे लिया?
कितने ब्याज पर लिया?
कितना पैसा पुराने कर्ज में चला गया?
कितना पैसा नई परिसंपत्तियों में लगा?
PSU और सरकारी संस्थाओं के माध्यम से कितनी देनदारी बनी?
कितनी सरकारी गारंटियां बकाया हैं?
और आने वाले 5 से 10 वर्षों में मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए कितनी राशि चाहिए होगी?
सबसे बड़ा सवाल—कर्ज से संपत्ति बन रही है या खर्च चल रहा है?
मध्यप्रदेश के लिए कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं है।
लेकिन असली कसौटी यह है कि आज लिया गया कर्ज कल कितनी आर्थिक ताकत पैदा करेगा।
अगर कर्ज से स्थायी परिसंपत्तियां और रोजगार पैदा होते हैं, तो यह निवेश है।
लेकिन अगर कर्ज केवल आज का खर्च चलाने और पुराने दायित्व चुकाने में इस्तेमाल हो रहा है, तो यह भविष्य पर बढ़ता हुआ बोझ बन सकता है।
निष्कर्ष
CAG की रिपोर्ट और बजट के आंकड़े एक गंभीर तस्वीर सामने रखते हैं—
देनदारियां बढ़ रही हैं, ब्याज का बोझ बढ़ रहा है, ऑफ-बजट उधारी पर सवाल हैं और कर्ज की वृद्धि पर भी चिंता जताई गई है।
इसलिए मध्यप्रदेश के सामने असली सवाल यह नहीं है कि—
“किस सरकार ने कितना कर्ज लिया?”
बल्कि सवाल यह है—
“जो कर्ज आज लिया जा रहा है, क्या वह आने वाली पीढ़ियों के लिए संपत्ति बना रहा है… या सिर्फ आज का खर्च चला रहा है?”


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